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सपने!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अप्रतिम हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – पँखों भर आकाश बाँध करसपने ! बहुत बड़े हो जाते…
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ये दौर किस तरह से!
ये दौर किस तरह से कटेगा पहाड़ सा, यारो बताओ हम में कोई कोहकन* भी है| *पर्वत खोदने वाला जाँ निसार अख़्तर
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सिर्फ़ रंग-ओ-बू नहीं!
बाज़ू छुआ जो तू ने तो उस दिन खुला ये राज़, तू सिर्फ़ रंग-ओ-बू ही नहीं है बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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हम को अज़ीज़ इश्क़!
अक़्ल-ए-मआश ओ हिकमत-ए-दुनिया के बावजूद, हम को अज़ीज़ इश्क़ का दीवाना-पन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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भारी-भारी तोपें हैं!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि तथा मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – ऑफिस केदरवाजों परकौन कह…