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कौन तिरी जुस्तुजू करे!
तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी,ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे| अहमद फ़राज़
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पर दिल ये चाहता है!
अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम का दुख नहीं, पर दिल ये चाहता है कि आग़ाज़ तू करे| अहमद फ़राज़
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दिल को लहू करे!
क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे,जो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे| अहमद फ़राज़
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देखो तो कितने शहर!
रोते हो इक जज़ीरा-ए-जाँ को ‘फ़राज़’ तुम,देखो तो कितने शहर समुंदर के हो गए| अहमद फ़राज़
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पुरानी पड़ी बीन पर राग नूतन!
आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय और श्रेष्ठ कवि रहे स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत –…
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काफ़र के हो गए!
समझा रहे थे मुझ को सभी नासेहान-ए-शहर,फिर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद उसी काफ़र के हो गए| अहमद फ़राज़
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ऐ याद यार तुझ से !
ऐ याद यार तुझ से करें क्या शिकायतें,ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गए| अहमद फ़राज़
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लोग थे कि जान से!
क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर अज़ीज़ थे,अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए| अहमद फ़राज़
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अंदर वो नफ़रतें थीं!
फिर यूँ हुआ कि ग़ैर को दिल से लगा लिया,अंदर वो नफ़रतें थीं कि बाहर के हो गए| अहमद फ़राज़