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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Sep 2024

    कौन तिरी जुस्तुजू करे!

    तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी,ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे| अहमद फ़राज़

  • 1st Sep 2024

    पर दिल ये चाहता है!

    अब तो हमें भी तर्क-ए-मरासिम का दुख नहीं, पर दिल ये चाहता है कि आग़ाज़ तू करे| अहमद फ़राज़

  • 1st Sep 2024

    दिल को लहू करे!

    क्या ऐसे कम-सुख़न से कोई गुफ़्तुगू करे,जो मुस्तक़िल सुकूत से दिल को लहू करे| अहमद फ़राज़

  • 1st Sep 2024

    देखो तो कितने शहर!

    रोते हो इक जज़ीरा-ए-जाँ को ‘फ़राज़’ तुम,देखो तो कितने शहर समुंदर के हो गए| अहमद फ़राज़

  • 1st Sep 2024

    पुरानी पड़ी बीन पर राग नूतन!

    आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय और श्रेष्ठ कवि रहे स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत –…

  • 31st Aug 2024

    अब के न इंतिज़ार!

    अब के न इंतिज़ार करें चारागर कि हम,अब के गए तो कू-ए-सितमगर के हो गए| अहमद फ़राज़

  • 31st Aug 2024

    काफ़र के हो गए!

    समझा रहे थे मुझ को सभी नासेहान-ए-शहर,फिर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद उसी काफ़र के हो गए| अहमद फ़राज़

  • 31st Aug 2024

    ऐ याद यार तुझ से !

    ऐ याद यार तुझ से करें क्या शिकायतें,ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गए| अहमद फ़राज़

  • 31st Aug 2024

    लोग थे कि जान से!

    क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर अज़ीज़ थे,अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए| अहमद फ़राज़

  • 31st Aug 2024

    अंदर वो नफ़रतें थीं!

    फिर यूँ हुआ कि ग़ैर को दिल से लगा लिया,अंदर वो नफ़रतें थीं कि बाहर के हो गए| अहमद फ़राज़

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