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हिस्सा!
आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि श्री नरेश सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| | इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश सक्सेना जी की यह कविता – बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगालेकिन उसमें कुछ नमक भी हैजो…
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टूट जाते हैं कभी!
आबगीनों की तरह दिल हैं ग़रीबों के ‘शमीम’,टूट जाते हैं कभी तोड़ दिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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हँस के हर साँस पे!
अपनी तारीख़-ए-मोहब्बत के वही हैं सुक़रात,हँस के हर साँस पे जो ज़हर पिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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पा-ए-नाज़ुक तो !
उन के क़दमों पे न रख सर के है ये बे-अदबी,पा-ए-नाज़ुक तो सर-आँखों पे लिए जाते हैं| शमीम जयपुरी
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मय भी पी जाती है!
नश्शा दोनों में है साक़ी मुझे ग़म दे के शराब,मय भी पी जाती है आँसू भी पिए जाते हैं| शमीम जयपुरी