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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Mar 2025

    किसी भी हुस्न को!

    नज़र की इंतिहा कोई न दिल की इंतिहा कोई,किसी भी हुस्न को हुस्न-ए-फ़रावाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    किसी भी दर्द को !

    अगर हद से गुज़र जाए दवा तो बन नहीं जाता,किसी भी दर्द को दुनिया का दरमाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    चराग़ाँ हम नहीं कहते!

    तुम्हारे जश्न को जश्न-ए-फ़रोज़ाँ हम नहीं कहते,लहू की गर्म बूँदों को चराग़ाँ हम नहीं कहते| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    तू न अब आए तो क्या!

    तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है,सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    चाँद निकला भी तो!

    आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें,चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    खोल देता है कोई!

    चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू,खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    तिलिस्मों की रिदा!

    ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया,ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा* रात गए|*चादर जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    गलियों में सदा!

    चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए,कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए| जाँ निसार अख़्तर

  • 8th Mar 2025

    वैभव के अमिट चरण-चिह्न!

    आज मैं श्रेष्ठ राजनेता, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और कवि भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता – विजय का पर्व!जीवन संग्राम की काली घड़ियों मेंक्षणिक…

  • 7th Mar 2025

    गर्मी-ए-हुस्न में वो!

    बर्क़ अगर गर्मी-ए-रफ़्तार में अच्छी है ‘अमीर‘, गर्मी-ए-हुस्न में वो बर्क़-जमाल अच्छा है| अमीर मीनाई

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