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वो हैं कि इक नज़र!
मैं हूँ कि इश्तियाक़ में सर-ता-क़दम नज़रवो हैं कि इक नज़र की इजाज़त नहीं मुझे एहसान दानिश
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इतना ज़रूर है कि!
ये तो नहीं कि तुम से मोहब्बत नहीं मुझे,इतना ज़रूर है कि शिकायत नहीं मुझे| एहसान दानिश
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अभी ज़माना कहाँ था!
पता नहीं ये परिंदे कहाँ से आ पहुँचे,अभी ज़माना कहाँ था उदास होने का| राहत इंदौरी
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मिरे लबों से तबस्सुम!
मिरे लबों से तबस्सुम मज़ाक़ करने लगा,मैं लिख रहा था क़सीदा उदास होने का| राहत इंदौरी
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मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ!
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ, पर तुम्हें भूला नहीं हूँ।…
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मैं तेरे पास बता!
मैं तेरे पास बता किस ग़रज़ से आया हूँ,सुबूत दे मुझे चेहरा-शनास होने का| राहत इंदौरी