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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Mar 2025

    ख़ुदा के होते हुए!

    न कर किसी पे भरोसा कि कश्तियाँ डूबें,ख़ुदा के होते हुए नाख़ुदा के होते हुए| अहमद फ़राज़

  • 13th Mar 2025

    न चाहने पे भी!

    न चाहने पे भी तुझ को ख़ुदा से माँग लिया,ये हाल है दिल-ए-बे-मुद्दआ के होते हुए| अहमद फ़राज़

  • 13th Mar 2025

    हवा के होते हुए!

    वो हीला-गर हैं जो मजबूरियाँ शुमार करें,चराग़ हम ने जलाए हवा के होते हुए| अहमद फ़राज़

  • 13th Mar 2025

    है आश्ना की तलब!

    ये क़ुर्बतों* में अजब फ़ासले पड़े कि मुझे,है आश्ना की तलब आश्ना के होते हुए| *Relations अहमद फ़राज़

  • 13th Mar 2025

    गिला फ़ुज़ूल था!

    गिला फ़ुज़ूल था अहद-ए-वफ़ा के होते हुए,सो चुप रहा सितम-ए-ना-रवा के होते हुए| अहमद फ़राज़

  • 13th Mar 2025

    सहर क़रीब है!

    सबा ने फिर दर-ए-ज़िंदाँ पे आ के दी दस्तक,सहर क़रीब है दिल से कहो न घबराए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 13th Mar 2025

    लिपटी परछाइयां!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। कुंवर नारायण जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर नारायण जी की यह कविता – उन परछाइयों को,जो अभी अभी चाँद की रसवंत गागर से गिरचाँदनी में सनीखिड़की पर…

  • 12th Mar 2025

    न दिन को अब्र आए!

    ये ज़िद है याद हरीफ़ान-ए-बादा-पैमा की, कि शब को चाँद न निकले न दिन को अब्र आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Mar 2025

    इक उम्र होने आई है!

    कोई पुकारो कि इक उम्र होने आई है,फ़लक को क़ाफ़िला-ए-रोज़-ओ-शाम ठहराए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Mar 2025

    गेसू फ़ज़ा में लहराए!

    शफ़क़ की राख में जल बुझ गया सितारा-ए-शाम,शब-ए-फ़िराक़ के गेसू फ़ज़ा में लहराए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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