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हमारे पास आ जाओ!
पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है,हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा| मुनव्वर राना
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बे-मौसम का फल है!
हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है,ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा| मुनव्वर राना
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तिरे एहसास की ईंटें!
तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में,हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा| मुनव्वर राना
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कभी महँगा नहीं होगा!
शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है,मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा| मुनव्वर राना
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ये दरवेशों की बस्ती है!
ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा,लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा| मुनव्वर राना
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इतनी शदीद ग़म की!
मैं क्यूँ किसी के अहद-ए-वफ़ा का यक़ीं करूँइतनी शदीद ग़म की ज़रूरत नहीं मुझे एहसान दानिश
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जो कुछ गुज़र रही है!
जो कुछ गुज़र रही है ग़नीमत है हम-नशीं अब ज़िंदगी पे ग़ौर की फ़ुर्सत नहीं मुझे| एहसान दानिश
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मेरी कुछ और रचनाएं-1
एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनका भी ढोल पीट लेता हूँ क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…
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वो हैं कि इक नज़र!
मैं हूँ कि इश्तियाक़ में सर-ता-क़दम नज़रवो हैं कि इक नज़र की इजाज़त नहीं मुझे एहसान दानिश