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ये भी इक सिलसिला!
शाइ’री ताज़ा ज़मानों की है मे’मार ‘फ़राज़’,ये भी इक सिलसिला-ए-कुन-फ़यकूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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रोज़ आ जाता है!
नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है,रोज़ आ जाता है समझाता है यूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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अब तुम आए हो!
अब तुम आए हो मिरी जान तमाशा करने,अब तो दरिया में तलातुम न सुकूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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तुम मोहब्बत में कहाँ!
तुम मोहब्बत में कहाँ सूद-ओ-ज़ियाँ ले आए,इश्क़ का नाम ख़िरद है न जुनूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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नोक-ए-हर-ख़ार पे!
तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर,नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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एक साया न दरूँ है!
जैसे कोई दर-ए-दिल पर हो सितादा कब से,एक साया न दरूँ है न बरूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़
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मुझे डर लगता है!
एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’ मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है | अब्बास ताबिश