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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Oct 2024

    ये भी इक सिलसिला!

    शाइ’री ताज़ा ज़मानों की है मे’मार ‘फ़राज़’,ये भी इक सिलसिला-ए-कुन-फ़यकूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़

  • 5th Oct 2024

    रोज़ आ जाता है!

    नासेहा तुझ को ख़बर क्या कि मोहब्बत क्या है,रोज़ आ जाता है समझाता है यूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़

  • 5th Oct 2024

    अब तुम आए हो!

    अब तुम आए हो मिरी जान तमाशा करने,अब तो दरिया में तलातुम न सुकूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़

  • 5th Oct 2024

    तुम मोहब्बत में कहाँ!

    तुम मोहब्बत में कहाँ सूद-ओ-ज़ियाँ ले आए,इश्क़ का नाम ख़िरद है न जुनूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़

  • 5th Oct 2024

    नोक-ए-हर-ख़ार पे!

    तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर,नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़

  • 5th Oct 2024

    एक साया न दरूँ है!

    जैसे कोई दर-ए-दिल पर हो सितादा कब से,एक साया न दरूँ है न बरूँ है यूँ है| अहमद फ़राज़

  • 5th Oct 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-9

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

  • 4th Oct 2024

    बरामद और कोई!

    अगर यूँही मुझे रक्खा गया अकेले में बरामद और कोई इस मकान से होगा अब्बास ताबिश

  • 4th Oct 2024

    वफ़ादार नहीं!

    जिस से पूछें तिरे बारे में यही कहता है ख़ूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता| अब्बास ताबिश

  • 4th Oct 2024

    मुझे डर लगता है!

    एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’ मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है | अब्बास ताबिश

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