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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Oct 2024

    ग़म-ए-यार के साथ!

    किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँ,ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ| क़तील शिफ़ाई

  • 8th Oct 2024

    दुश्मनी धूप की है!

    ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे,दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ| क़तील शिफ़ाई

  • 8th Oct 2024

    वक़्त की रफ़्तार!

    राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ,हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ| क़तील शिफ़ाई

  • 8th Oct 2024

    आशा – 1 / कामायनी

    आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी का एक अंश शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – ऊषा सुनहले तीर बरसती,जयलक्ष्मी-सी उदित…

  • 7th Oct 2024

    उड़ता है अश्क!

    हंगाम-ए-गिर्या आह से नादाँ ‘असर’ हज़र,उड़ता है अश्क जैसे शरारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    तेरी नज़र से तेरा!

    ऐ शाहिद-ए-जमाल कोई शक्ल है कि हो,तेरी नज़र से तेरा नज़ारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    क़तरे से एक मौज!

    क़तरे से एक मौज ये कहती निकल गई,साहिल से मस्लहत है किनारा कभी कभी| असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    दिल को हो काश!

    रुस्वाइयों से दूर नहीं बे-क़रारियाँदिल को हो काश सब्र का यारा कभी कभी असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    दिल को क्या करूँ!

    मैं ने तो होंट सी लिए इस दिल को क्या करूँबे-इख़्तियार तुम को पुकारा कभी कभी असर लखनवी

  • 7th Oct 2024

    सितारा कभी कभी!

    हर-चंद अश्क-ए-यास जब उमडे तो पी गएचमका फ़लक पे एक सितारा कभी कभी असर लखनवी

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