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ग़म-ए-यार के साथ!
किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँ,ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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दुश्मनी धूप की है!
ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे,दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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वक़्त की रफ़्तार!
राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ,हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ| क़तील शिफ़ाई
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आशा – 1 / कामायनी
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी का एक अंश शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह रचना – ऊषा सुनहले तीर बरसती,जयलक्ष्मी-सी उदित…
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दिल को क्या करूँ!
मैं ने तो होंट सी लिए इस दिल को क्या करूँबे-इख़्तियार तुम को पुकारा कभी कभी असर लखनवी