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क्या जवाब आएगा!
इस को पहली बार ख़त लिक्खा तो दिल धड़का बहुत,क्या जवाब आएगा कैसे आएगा डर था बहुत| मंज़र भोपाली
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तरसते हैं बहुत से!
ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है ‘मंज़र’,तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को| मंज़र भोपाली
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कमानों में खिंचे हैं!
कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी,ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को| मंज़र भोपाली
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तरसती है आँख!
बहुत से आइना-ख़ाने हैं इस बस्ती में लेकिन,तरसती है हमारी आँख चेहरा देखने को| मंज़र भोपाली
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खड़े हैं राह चलते!
खड़े हैं राह चलते लोग कितनी ख़ामुशी से,सड़क पर मरने वालों का तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली
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तमाशा देखने को!
गए थे शौक़ से हम भी ये दुनिया देखने को,मिला हम को हमारा ही तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली
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चीख़ों से पुकारों से!
कभी पत्थर के दिल ऐ ‘कैफ़’ पिघले हैं न पिघलेंगे,मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से| कैफ़ भोपाली
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नववर्ष – चार कविताएं
आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ और श्रेष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की नववर्ष पर लिखी गई चार कविताएं शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविताएं – कल नव वर्ष आने वाला हैआज…
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रूह की आवाज़!
बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है,कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से| कैफ़ भोपाली
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गुफाओं से पहाड़ों से!
सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है,गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से| कैफ़ भोपाली