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पाबंदियाँ निभाते हुए!
न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी,तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए| अज़हर इक़बाल
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लोग हँसते गाते हुए!
ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे,कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए| अज़हर इक़बाल
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अंग-अंग चन्दनवन!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और संपादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का एक नावगीत शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह नवगीत – एक नाम अधरों पर आयाअंग-अंग चन्दनवन हो गया। बोल…
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मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ!
घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए,मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए| अज़हर इक़बाल
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मंज़िल का पता!
हाँ मगर तस्दीक़ में उम्रें गुज़र जाती हैं ‘नूर’,कुछ न कुछ रहता है सब को अपनी मंज़िल का पता| कृष्ण बिहारी नूर
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प्यार सच्चा है तो फिर!
ज़िंदाबाद ऐ दिल मिरे मैं भी हूँ तुझ से मुत्तफ़िक़,प्यार सच्चा है तो फिर कैसी वफ़ा कैसी जफ़ा| कृष्ण बिहारी नूर
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रास्ते से हट गया!
जब न मुझ से बन सकी उस तक रसाई की सबील,एक दिन मैं ख़ुद ही अपने रास्ते से हट गया| कृष्ण बिहारी नूर
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आइना-दर-आइना!
हुस्न-ओ-उलफ़त दोनों हैं अब एक सत्ह पर मगर,आइना-दर-आइना बस आइना-दर-आइना| कृष्ण बिहारी नूर
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बंद हो जाता है!
जैसे अन-देखे उजाले की कोई दीवार हो,बंद हो जाता है कुछ दूरी पे हर इक रास्ता| कृष्ण बिहारी नूर
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फूल में रंगत भी थी!
फूल में रंगत भी थी ख़ुशबू भी थी और हुस्न भी,उस ने आवाज़ें तो दीं लेकिन कहाँ मैं सुन सका| कृष्ण बिहारी नूर