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तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ!
तेग़ मुंसिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद,बेगुनाह कौन है उस शहर में क़ातिल के सिवा| अली सरदार जाफ़री
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कोहरा!
आज पहली बार फिर मैं, हिन्दी नवगीत के श्रेष्ठ हस्ताक्षर स्वर्गीय अश्वघोष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मैं शायद उनसे कभी मिला नहीं किन्तु वे मेरे मित्रों के मित्र थे और कल ही उनके देहांत का दुखद समाचार मिला| अश्वघोष जी की रचनाएं शायद मैंने पहले कभी शेयर नहीं की हैं| लीजिए…
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हम ने दुनिया की!
हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को,लेकिन इक शोख़ के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा| अली सरदार जाफ़री
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हमसफ़र कोई नहीं!
बाइस-ए-रश्क़ है तन्हारवी-ए-रहरौ-ए-शौक़,हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंजिल के सिवा| अली सरदार जाफ़री
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रास्ते बन्द हैं सब!
काम अब कोई न आयेगा बस इक दिल के सिवा,रास्ते बन्द हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा| अली सरदार जाफ़री
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मुझे तू क्या समझा!
मेरा हर शेर है इक राज़-ए-हक़ीक़त ‘बेख़ुद’,मैं हूँ उर्दू का ‘नज़ीरी’ मुझे तू क्या समझा| बेख़ुद देहलवी
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एक वो हैं जिन्हें!
एक वो हैं जिन्हें दुनिया की बहारें हैं नसीब,एक मैं हूँ क़फ़स-ए-तंग को दुनिया समझा| बेख़ुद देहलवी
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ख़ाक का पुतला!
क्या कहूँ मेरे समाने को समझ है दरकार,ख़ाक समझा जो मुझे ख़ाक का पुतला समझा| बेख़ुद देहलवी
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मुझ को तमाशा!
असर-ए-हुस्न कहूँ या कशिश-ए-इश्क़ कहूँ,मैं तमाशाई था वो मुझ को तमाशा समझा| बेख़ुद देहलवी
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नदी बाढ़ के!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी नवगीत के श्रेष्ठ हस्ताक्षर श्री अनूप अशेष जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अशेष जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत – हम सूखे बादल को जीतेकिन दरवाज़ोंदिन आषाढ़ के। अपने भीतर धूप…