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ग़म नहीं लिक्खूँ क्या!
ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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इस घर में!
आज मैं अपने वरिष्ठ कवि मित्र स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता – इस घर में घर से ज़्यादा धुआँअँधेरे से ज़्यादा अँधेरादीवार से बड़ी दरार। इस घर…
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किन लफ़्ज़ों में इतनी!
किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ,शे’र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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ऐसे सुख़नफ़रोश को!
तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले,ऐसे सुख़न-फ़रोश को मर जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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इल्ज़ाम ये भी चाँद के!
सारा ज्वार-भाटा मिरे दिल में है मगर,इल्ज़ाम ये भी चाँद के सर जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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क्या चल सकेंगे!
क्या चल सकेंगे जिन का फ़क़त मसअला ये है,जाने से पहले रख़्त-ए-सफ़र जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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कुछ फ़ैसला तो हो !
कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिए,पानी को अब तो सर से गुज़र जाना चाहिए| परवीन शाकिर
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एक मुश्त-ए-ख़ाक!
एक मुश्त-ए-ख़ाक और वो भी हवा की ज़द में है,ज़िंदगी की बेबसी का इस्तिआ’रा देखना| परवीन शाकिर
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आइने की आँख ही!
आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए,जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना| परवीन शाकिर