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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Apr 2025

    कैसे मैं बरसात लिखूँ!

    कैसे लिखूँ मैं चाँद के क़िस्से कैसे लिखूँ मैं फूल की बात,रेत उड़ाए गर्म हवा तो कैसे मैं बरसात लिखूँ| जावेद अख़्तर

  • 15th Apr 2025

    ग़म नहीं लिक्खूँ क्या!

    ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर

  • 15th Apr 2025

    इस घर में!

    आज मैं अपने वरिष्ठ कवि मित्र स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता – इस घर में घर से ज़्यादा धुआँअँधेरे से ज़्यादा अँधेरादीवार से बड़ी दरार। इस घर…

  • 14th Apr 2025

    किन लफ़्ज़ों में इतनी!

    किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ,शे’र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ| जावेद अख़्तर

  • 14th Apr 2025

    ऐसे सुख़नफ़रोश को!

    तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले,ऐसे सुख़न-फ़रोश को मर जाना चाहिए| परवीन शाकिर

  • 14th Apr 2025

    इल्ज़ाम ये भी चाँद के!

    सारा ज्वार-भाटा मिरे दिल में है मगर,इल्ज़ाम ये भी चाँद के सर जाना चाहिए| परवीन शाकिर

  • 14th Apr 2025

    क्या चल सकेंगे!

    क्या चल सकेंगे जिन का फ़क़त मसअला ये है,जाने से पहले रख़्त-ए-सफ़र जाना चाहिए| परवीन शाकिर

  • 14th Apr 2025

    कुछ फ़ैसला तो हो !

    कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिए,पानी को अब तो सर से गुज़र जाना चाहिए| परवीन शाकिर

  • 14th Apr 2025

    एक मुश्त-ए-ख़ाक!

    एक मुश्त-ए-ख़ाक और वो भी हवा की ज़द में है,ज़िंदगी की बेबसी का इस्तिआ’रा देखना| परवीन शाकिर

  • 14th Apr 2025

    आइने की आँख ही!

    आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए,जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना| परवीन शाकिर

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