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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Apr 2025

    सहर ने अंधी गली!

    सहर ने अंधी गली की तरफ़ नहीं देखा,जिसे तलब थी उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    घन का गिरि!

    आज मैं हिंदी के विख्यात समीक्षक और कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। नामवर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत– घन का गिरि, शिखर स्थित रवि             यह सरि वेला !वन – उपवन सुरभि सजग              मलय वलय बेला !…

  • 16th Apr 2025

    कोई तराना कोई!

    बहुत दिनों से दिल-ओ-जाँ की महफ़िलें हैं उदास,कोई तराना कोई दास्ताँ सुनाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    दिखा के जलवा!

    दिखा के जलवा-ए-फ़र्दा बना दे दीवाना,नए ज़माने के रुख़ से नक़ाब उठाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    जो हो सके तो बदल!

    जो हो सके तो बदल ज़िंदगी को ख़ुद वर्ना,नज़ाद-ए-नौ को तरीक़-ए-जुनूँ सिखाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    नवा-ए-तल्ख़ को!

    बला से बज़्म में गर ज़ौक़-ए-नग़्मगी कम है,नवा-ए-तल्ख़ को कुछ तल्ख़-तर बनाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    गुलों को छेड़ के!

    गुज़र चमन से मिसाल-ए-नसीम-ए-सुब्ह-ए-बहार,गुलों को छेड़ के काँटों को गुदगुदाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    भटक रही है अँधेरे में!

    भटक रही है अँधेरे में ज़िंदगी की बरात,कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़र जलाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    ये एक पल है उसे!

    अदम हयात से पहले अदम हयात के बा’द,ये एक पल है उसे जावेदाँ बनाता जा| अली सरदार जाफ़री

  • 16th Apr 2025

    आ गया है जहाँ में!

    अब आ गया है जहाँ में तो मुस्कुराता जा,चमन के फूल दिलों के कँवल खिलाता जा| अली सरदार जाफ़री

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