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शीशा-ए-मय में!
बे-पिए हूँ कि अगर लुत्फ़ करो आख़िर-ए-शब, शीशा-ए-मय में ढले सुब्ह के आग़ाज़ का रंग| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तिरी आवाज़ का रंग!
साया-ए-चश्म में हैराँ रुख़-ए-रौशन का जमाल,सुर्ख़ी-ए-लब में परेशाँ तिरी आवाज़ का रंग| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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यूँ सजा चाँद कि!
यूँ सजा चाँद कि झलका तिरे अंदाज़ का रंग,यूँ फ़ज़ा महकी कि बदला मिरे हमराज़ का रंग| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दर्द सोया भी नहीं था!
वो सितम-केश बहर-हाल सितम-केश रहे,दर्द सोया भी नहीं था कि जगाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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यादों के ख़ज़ाने!
जिन किताबों पे सलीक़े से जमी वक़्त की गर्द,उन किताबों ही में यादों के ख़ज़ाने निकले| रज़ा अमरोहवी
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उन्हें घर मुबारक हमें अपनी आहें!
आज फिर से एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| काफी दिन से मैंने अपने प्रिय गायक मुकेश जी का कोई गीत शेयर नहीं किया था, आज कर लेता हूँ| जी हाँ ये गीत है 1958 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘परवरिश’ का, गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और इसका संगीत दिया है- दत्ताराम…
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सर-फिरे शहर!
देखना ये है ठहरता है कहाँ जोश-ए-जुनूँ,सर-फिरे शहर-ए-निगाराँ को जलाने निकले| रज़ा अमरोहवी