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साहिलों पर मैं खड़ा!
साहिलों पर मैं खड़ा हूँ तिश्ना-कामों की तरह,कोई मौज-ए-आब मेरी आँख को पानी करे| महताब हैदर नक़वी
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ख़्वाब ऐसा हो जो!
रात ऐसी चाहिए माँगे जो दिन भर का हिसाब,ख़्वाब ऐसा हो जो इन आँखों में वीरानी करे| महताब हैदर नक़वी
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शारद प्रात!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह रचना अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल थी| केदारनाथ सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की यह कविता –…
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कितनी दहलीज़ों पे!
एक मैं हूँ और दस्तक कितने दरवाज़ों पे दूँ, कितनी दहलीज़ों पे सज्दा एक पेशानी करे| महताब हैदर नक़वी
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कोई साया मेरे!
धूप में इन आबगीनों को लिए फिरता हूँ मैं,कोई साया मेरे ख़्वाबों की निगहबानी करे| महताब हैदर नक़वी
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देखे कि हैरानी करे!
मुख़्तसर सी ज़िंदगी में कितनी नादानी करे,इन नज़ारों को कोई देखे कि हैरानी करे| महताब हैदर नक़वी
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क़िस्मत को जगा भी न सकूँ!
इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर,अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ अमीर मीनाई
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जो मिटा भी न सकूँ!
बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को,ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ| अमीर मीनाई