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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Nov 2024

    ज़ख़्म भी इतने हरे!

    ज़ख़्म भी इतने हरे पहले न थे,ये चमन गुल-रंग भी ऐसा न था| महताब हैदर नक़वी

  • 4th Nov 2024

    आसमाँ ऐसा न था!

    ये ज़मीं वो आसमाँ ऐसा न था,इस तरह दरिया कभी बहता न था| महताब हैदर नक़वी

  • 4th Nov 2024

    साहिलों पर मैं खड़ा!

    साहिलों पर मैं खड़ा हूँ तिश्ना-कामों की तरह,कोई मौज-ए-आब मेरी आँख को पानी करे| महताब हैदर नक़वी

  • 4th Nov 2024

    ख़्वाब ऐसा हो जो!

    रात ऐसी चाहिए माँगे जो दिन भर का हिसाब,ख़्वाब ऐसा हो जो इन आँखों में वीरानी करे| महताब हैदर नक़वी

  • 4th Nov 2024

    शारद प्रात!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह रचना अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल थी| केदारनाथ सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की यह कविता –…

  • 3rd Nov 2024

    कितनी दहलीज़ों पे!

    एक मैं हूँ और दस्तक कितने दरवाज़ों पे दूँ, कितनी दहलीज़ों पे सज्दा एक पेशानी करे| महताब हैदर नक़वी

  • 3rd Nov 2024

    कोई साया मेरे!

    धूप में इन आबगीनों को लिए फिरता हूँ मैं,कोई साया मेरे ख़्वाबों की निगहबानी करे| महताब हैदर नक़वी

  • 3rd Nov 2024

    देखे कि हैरानी करे!

    मुख़्तसर सी ज़िंदगी में कितनी नादानी करे,इन नज़ारों को कोई देखे कि हैरानी करे| महताब हैदर नक़वी

  • 3rd Nov 2024

    क़िस्मत को जगा भी न सकूँ!

    इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर,अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ अमीर मीनाई

  • 3rd Nov 2024

    जो मिटा भी न सकूँ!

    बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को,ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ| अमीर मीनाई

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