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पर्वत पर आग जला!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| ठाकुर प्रसाद सिंह जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – पर्वत पर आग जला बासन्ती रात मेंनाच रहे हैं हम-तुम…
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इश्क़ का मारा जाने है!
क्या क्या फ़ित्ने सर पर उस के लाता है माशूक़ अपना,जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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रम्ज़ ओ इशारा जाने!
मेहर ओ वफ़ा ओ लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं,और तो सब कुछ तंज़ ओ किनाया रम्ज़ ओ इशारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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दर्द का चारा जाने है!
चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं,वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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आशिक़ सा तो सादा!
आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में,जी के ज़ियाँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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कब मौजूद ख़ुदा को!
आगे उस मुतकब्बिर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं,कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर-ए-ख़ुद-आरा जाने है| मीर तक़ी मीर
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बाग़ तो सारा जाने है!
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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पुरातन और नूतन – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…