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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Nov 2024

    मुद्दआ’ क्या है!

    मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ,काश पूछो कि मुद्दआ’ क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 27th Nov 2024

    आगे गहन अन्धेरा है!

    आज मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेमिचन्द्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नेमिचन्द्र जैन जी की यह कविता – आगे गहन अन्धेरा है, मन रुक-रुक जाता है एकाकीअब भी है टूटे प्राणों में किस छबि…

  • 26th Nov 2024

    ये माजरा क्या है!

    हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार, या इलाही ये माजरा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 26th Nov 2024

    दिल-ए-नादाँ तुझे!

    दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,आख़िर इस दर्द की दवा क्या है| मिर्ज़ा ग़ालिब

  • 26th Nov 2024

    झुका दरख़्त हवा से!

    झुका दरख़्त हवा से तो आँधियों ने कहा,ज़ियादा फ़र्क़ नहीं झुकने टूट जाने में| जावेद अख़्तर

  • 26th Nov 2024

    पर इक सुकून था!

    समझ लिया था कभी इक सराब को दरिया,पर इक सुकून था हम को फ़रेब खाने में| जावेद अख़्तर

  • 26th Nov 2024

    गँवा दिया उसे हमने!

    लतीफ़ था वो तख़य्युल से ख़्वाब से नाज़ुक,गँवा दिया उसे हम ने ही आज़माने में| जावेद अख़्तर

  • 26th Nov 2024

    कि हम ने देर लगा दी!

    जो मुंतज़िर न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा, कि हम ने देर लगा दी पलट के आने में| जावेद अख़्तर

  • 26th Nov 2024

    ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी!

    न तो दम लेती है तू और न हवा थमती है,ज़िंदगी ज़ुल्फ़ तिरी कोई सँवारे कैसे| जावेद अख़्तर

  • 26th Nov 2024

    राख में फिर ये !

    दिल बुझा जितने थे अरमान सभी ख़ाक हुए,राख में फिर ये चमकते हैं शरारे कैसे| जावेद अख़्तर

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