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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th May 2025

    आसमाँ ऐसा भी क्या!

    आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से,इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    वक़्त होंटों से मिरे!

    वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    बच्चा निराले मेरे खेल!

    रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल,मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    बन गई है मसअला!

    मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए,बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 11th May 2025

    अपने सहारे उठा!

    झील पतवार वापस न देगी कभी,अपनी कश्ती अब अपने सहारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th May 2025

    सारे नज़ारे उठा!

    रंग से रंग मिलने न पाए कहीं,एक एक कर के सारे नज़ारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th May 2025

    तेरा मक़्सद है क्या!

    तेरा मक़्सद है क्या मैं समझ जाऊँगा,कोई मौसम ही की बात प्यारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th May 2025

    बदन पर लकीरें!

    आँख की उस बदन पर लकीरें खिंचीं,हर ग़ज़ल से नए इस्तिआ’रे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

  • 11th May 2025

    आने वाले हैं शिकारी मेरे गाँव में!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की है। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का यह गीत – आने वाले हैं शिकारी मेरे गाँव मेंजनता है चिन्ता की मारी मेरे गाँव में फिर वही चौराहे…

  • 10th May 2025

    आख़िरी है सफ़र!

    आख़िरी है सफ़र वो सुबुक-सर चले,उस के दामन से अपने सितारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर

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