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क्यूँ वक़्त एक मोड़ पे!
चल चल के थक गया है कि मंज़िल नहीं कोई,क्यूँ वक़्त एक मोड़ पे ठहरा हुआ सा है| शहरयार
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गुलशन में इस तरह से!
गुलशन में इस तरह से कब आई थी फ़स्ल-ए-गुल,हर फूल अपनी शाख़ से टूटा हुआ सा है| शहरयार
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पीले फूल कनेर के!
आज मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मेहता जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी का यह नवगीत – पीले फूल कनेर केपट अंगोरते सिन्दूरी बड़री अँखियन केफूले फूल दुपेर के। दौड़ी हिरनाबन-बन अंगनावोंत वनों…