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मुस्तक़िल ज़ख़्म का!
मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन,मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है| मुनव्वर राना
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कोई मंज़र हो मिरा!
सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है,कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है| मुनव्वर राना
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ख़ाक आँखों से लगाई!
ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ,अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है| मुनव्वर राना
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रेत पर ओस से!
वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है,रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है| मुनव्वर राना
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जीवन में कितना सूनापन!
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – जीवन में कितना सूनापनपथ निर्जन है, एकाकी है,उर में मिटने का आयोजनसामने…
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यारों के इल्तिफ़ात का!
लगता है उस की बातों से ये ‘शहरयार’ भी,यारों के इल्तिफ़ात का मारा हुआ सा है| शहरयार
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दुनिया के कारोबार से!
पहले थे जो भी आज मगर कारोबार-ए-इश्क़,दुनिया के कारोबार से मिलता हुआ सा है| शहरयार
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ले दे के एक दिल है!
नज़राना तेरे हुस्न को क्या दें कि अपने पास,ले दे के एक दिल है सो टूटा हुआ सा है| शहरयार
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चेहरा हर एक शख़्स का!
क्या हादिसा हुआ है जहाँ में कि आज फिर,चेहरा हर एक शख़्स का उतरा हुआ सा है| शहरयार
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क्यूँ वक़्त एक मोड़ पे!
चल चल के थक गया है कि मंज़िल नहीं कोई,क्यूँ वक़्त एक मोड़ पे ठहरा हुआ सा है| शहरयार