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कि है तेरे बग़ैर!
जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर,आज तक हर नक़्श फ़रियादी मिरी तहरीर का| अहमद फ़राज़
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मैं ने ये आलम भी!
जिस तरह बादल का साया प्यास भड़काता रहे,मैं ने ये आलम भी देखा है तिरी तस्वीर का| अहमद फ़राज़
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कैसे पाया था तुझे!
कैसे पाया था तुझे फिर किस तरह खोया तुझे,मुझ सा मुंकिर भी तो क़ाएल हो गया तक़दीर का| अहमद फ़राज़
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ख़्वाब क्या देखा कि!
रात क्या सोए कि बाक़ी उम्र की नींद उड़ गई,ख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ताबीर का| अहमद फ़राज़
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होने लगा तस्वीर का!
मुंतज़िर कब से तहय्युर है तिरी तक़रीर का,बात कर तुझ पर गुमाँ होने लगा तस्वीर का| अहमद फ़राज़
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देखी केवल भीड़ और!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की यह कविता – शायद तुमने, दुनिया को, देखा ही नहीं क़रीब सेइसीलिए बातें…
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दामन-ए-दर्द को!
दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है,आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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उनका जिगर तो देखो!
वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं,देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इक नज़र तुम मिरा!
वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से,इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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गुल खिले जाते हैं वो!
गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो,गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़