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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 4th Jun 2025

    बहुत से शे’र मुझ से!

    बहुत से शे‘र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर, बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    कहीं ऐसा न हो!

    नज़र-अंदाज़ कर मुझ को ज़रा सा खुल के जीने दे,कहीं ऐसा न हो तेरी निगहबानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    वीराने से मर जाऊँ!

    ग़नीमत है परिंदे मेरी तन्हाई समझते हैं,अगर ये भी न हों तो घर के वीराने से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    आसानी से मर जाऊँ!

    मैं इतना सख़्त-जाँ हूँ दम बड़ी मुश्किल से निकलेगा,ज़रा तकलीफ़ बढ़ जाए तो आसानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    हैरानी से मर जाऊँ!

    तुम उस को देख कर छू कर भी ज़िंदा लौट आए हो,मैं उस को ख़्वाब में देखूँ तो हैरानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    मैं पानी से मर जाऊँ!

    लब-ए-साहिल समुंदर की फ़रावानी से मर जाऊँ,मुझे वो प्यास है शायद कि मैं पानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    न जाने किधर गया वो!

    वो रात का बे-नवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा ‘नासिर’,तिरी गली तक तो हम ने देखा था फिर न जाने किधर गया वो| नासिर काज़मी

  • 4th Jun 2025

    सर झुकाए गुज़र गया!

    वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तू ने मंज़िलों का,तिरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाए गुज़र गया वो| नासिर काज़मी

  • 4th Jun 2025

    काल तुझसे होड़ है मेरी!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – काल,तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू-तुझमें अपराजित मैं वास करूं ।इसीलिए तेरे हृदय…

  • 3rd Jun 2025

    कल रात मर गया वो!

    वो हिज्र की रात का सितारा वो हम-नफ़स हम-सुख़न हमारा, सदा रहे उस का नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो| नासिर काज़मी

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