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निभाते हुए मर जाते हैं!
हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस,जो तअ’ल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश
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हम परिंदे कहीं !
दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं,हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं। अब्बास ताबिश
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ज़िंदगी की ना टूटे लड़ी !
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में फिल्म- क्रांति के लिए नितिन मुकेश और लता मंगेशकर जी द्वारा गया ये गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- ज़िंदगी की ना टूटे लड़ी , प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी ! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ******
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देश से जब परदेस!
देश से जब परदेस सिधारे हम पर ये भी वक़्त पड़ा,नज़्में छोड़ी ग़ज़लें छोड़ी गीतों का बेवपार किया| जाँ निसार अख़्तर
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अन्दाज़!
आज एक बार फिर मैं अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता – अन्दाज़ लग जाता हैकि घिरने वाले हैं बादलफटने वाला…
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ख़ाका तय्यार किया!
अब तुम सोचो अब तुम जानो जो चाहो अब रंग भरो,हम ने तो इक नक़्शा खींचा इक ख़ाका तय्यार किया| जाँ निसार अख़्तर
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महफ़िल पर जब नींद!
महफ़िल पर जब नींद सी छाई सब के सब ख़ामोश हुए, हम ने तब कुछ शेर सुनाया लोगों को बेदार किया| जाँ निसार अख़्तर
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हम ने सारी उम्र ही!
इश्क़ में क्या नुक़सान नफ़ा है हम को क्या समझाते हो,हम ने सारी उम्र ही यारो दिल का कारोबार किया| जाँ निसार अख़्तर
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हम पर कितनी बार !
हम पर कितनी बार पड़े ये दौरे भी तन्हाई के,जो भी हम से मिलने आया मिलने से इंकार किया| जाँ निसार अख़्तर
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शक्ल दिखाई तब!
क़तरा क़तरा सिर्फ़ हुआ है इश्क़ में अपने दिल का लहू,शक्ल दिखाई तब उस ने जब आँखों को ख़ूँ-बार किया| जाँ निसार अख़्तर