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मैं भी रोज़ इक ख़्वाब!
तुम भी हर शब दिया जला कर पलकों की दहलीज़ पे रखना,मैं भी रोज़ इक ख़्वाब तुम्हारे शहर की जानिब भेजूँगा| अमजद इस्लाम अमजद
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मैं आसमान को देखूँगा!
अपने घर की खिड़की से मैं आसमान को देखूँगा,जिस पर तेरा नाम लिखा है उस तारे को ढूँडूँगा| अमजद इस्लाम अमजद
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सहर होने को भी हम!
‘फ़िराक़’ इस गर्दिश-ए-अय्याम से कब काम निकला है,सहर होने को भी हम रात कट जाना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ज़िंदा हैं-2
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरी ग़ज़ल के कुछ और शेर, कुछ शेर मैंने कल प्रस्तुत किए थे- आशा है आपको ये पसंद आएंगे,धन्यवाद । ******
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न हम क़तरा समझते हैं!
ये हस्ती नीस्ती सब मौज-ख़ेज़ी है मोहब्बत की,न हम क़तरा समझते हैं न हम दरिया समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उसे सहरा समझते हैं!
ये कह कर आबला-पा रौंदते जाते हैं काँटों को,जिसे तलवों में कर लें जज़्ब उसे सहरा समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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तुम आ गए हो, नूर आ गया है!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में, ‘आंधी’ फिल्म का लोकप्रिय गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे किशोर कुमार जी और लता मंगेशकर जी ने गाया था और गुलज़ार जी ने लिखा था-तुम आ गए हो नूर आ गया है, नहीं तो चरागों से लौ जा रही थी! आशा है आपको…
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तुझे अपना समझते हैं!
भुला दीं एक मुद्दत की जफ़ाएँ उस ने ये कह कर,तुझे अपना समझते थे तुझे अपना समझते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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किसने बाँसुरी बजाई!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। शास्त्री जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी का यह नवगीत– जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !किसने बाँसुरी बजाई अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूलेसूखी…