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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Jan 2025

    सिलसिला ख़्वाबों का!

    एक शब के टुकड़ों के नाम मुख़्तलिफ़ रखे,जिस्म-ओ-रूह का बंधन सिलसिला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर

  • 2nd Jan 2025

    फ़ासला है ख़्वाबों का!

    जागती हक़ीक़त तक रास्ता है ख़्वाबों का,दरमियाँ मिरे उन के फ़ासला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर

  • 2nd Jan 2025

    हम ठहरे बंजारे लोग!

    इस नगरी में क्यूँ मिलती है रोटी सपनों के बदले,जिन की नगरी है वो जानें हम ठहरे बंजारे लोग| जावेद अख़्तर

  • 2nd Jan 2025

    कैसे प्यारे प्यारे लोग!

    नेकी इक दिन काम आती है हम को क्या समझाते हो,हम ने बे-बस मरते देखे कैसे प्यारे प्यारे लोग| जावेद अख़्तर

  • 2nd Jan 2025

    साँसों के इक्तारे लोग!

    वक़्त सिंघासन पर बैठा है अपने राग सुनाता है,संगत देने को पाते हैं साँसों के इक्तारे लोग| जावेद अख़्तर

  • 2nd Jan 2025

    धीरे धीरे हारे लोग!

    जीवन जीवन हम ने जग में खेल यही होते देखा,धीरे धीरे जीती दुनिया धीरे धीरे हारे लोग| जावेद अख़्तर

  • 2nd Jan 2025

    जाड़ा: दो कविताएँ!

    आज मैं प्रसिद्ध साहित्यकार और कवि श्री रामदरश मिश्र जी की सर्दी के मौसम पर लिखी गई दो कविताएं शेयर कर रहा हूँ। मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र की यह ग़ज़ल – एक माघ की ठंडी हवाएँ डंक मार रही हैं,गर्म…

  • 1st Jan 2025

    कैसे हैं बेचारे लोग!

    दुख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग, जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग| जावेद अख़्तर

  • 1st Jan 2025

    तिरा क्या ख़याल है!

    फिर कोई ख़्वाब देखूँ कोई आरज़ू करूँ,अब ऐ दिल-ए-तबाह तिरा क्या ख़याल है| जावेद अख़्तर

  • 1st Jan 2025

    ये मेरा ही जाल है!

    बे-दस्त-ओ-पा हूँ आज तो इल्ज़ाम किस को दूँ,कल मैं ने ही बुना था ये मेरा ही जाल है| जावेद अख़्तर

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