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मिले न छाँव मगर!
कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के,मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़म-कदों की भी राहें!
अब इतनी बंद नहीं ग़म-कदों की भी राहें,हवा-ए-कूच-ए-महबूब चल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दीवारें !
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – जिस दिन हमने तोडी थीं पहली दीवारें,(तुम्हें याद है?)छाती में उत्साहकंठ में जयध्वनियां…
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अगर तू चाहे तो!
अगर तू चाहे तो ग़म वाले शादमाँ हो जाएँ, निगाह-ए-यार ये हसरत निकल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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बुझे हुए नहीं इतने!
बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी,फ़सुर्दगी में तबीअ’त मचल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दुनिया बदल तो!
‘फ़िराक़’ इक नई सूरत निकल तो सकती है,ब-क़ौल उस आँख के दुनिया बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दिल मगर नाम!
मेरे लफ़्ज़ों में भी छुपता नहीं पैकर उस का,दिल मगर नाम बताना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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हम को औरों पे!
अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं,हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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जो हमें ख़्वाब दिखाना!
कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें,जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी