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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Jan 2025

    मिले न छाँव मगर!

    कड़े हैं कोस बहुत मंज़िल-ए-मोहब्बत के,मिले न छाँव मगर धूप ढल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 12th Jan 2025

    ग़म-कदों की भी राहें!

    अब इतनी बंद नहीं ग़म-कदों की भी राहें,हवा-ए-कूच-ए-महबूब चल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 12th Jan 2025

    दीवारें !

    आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – जिस दिन हमने तोडी थीं पहली दीवारें,(तुम्हें याद है?)छाती में उत्साहकंठ में जयध्वनियां…

  • 11th Jan 2025

    अगर तू चाहे तो!

    अगर तू चाहे तो ग़म वाले शादमाँ हो जाएँ, निगाह-ए-यार ये हसरत निकल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Jan 2025

    बुझे हुए नहीं इतने!

    बुझे हुए नहीं इतने बुझे हुए दिल भी,फ़सुर्दगी में तबीअ’त मचल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Jan 2025

    बहल तो सकती है!

    तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना,कहानियों से शब-ए-ग़म बहल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Jan 2025

    दुनिया बदल तो!

    ‘फ़िराक़’ इक नई सूरत निकल तो सकती है,ब-क़ौल उस आँख के दुनिया बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Jan 2025

    दिल मगर नाम!

    मेरे लफ़्ज़ों में भी छुपता नहीं पैकर उस का,दिल मगर नाम बताना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2025

    हम को औरों पे!

    अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं,हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

  • 11th Jan 2025

    जो हमें ख़्वाब दिखाना!

    कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें,जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी

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