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उदास कर के मुझे !
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे,गया फिर आज का दिन भी उदास कर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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शाख़ फल तो सकती!
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार,यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रह गया सब कुछ !
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत – रह गया सब कुछ बिखर करइन दिनों है दुख शिखर पर एक पल में हो…
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बात खल तो सकती है!
जो तू ने तर्क-ए-मोहब्बत को अहल-ए-दिल से कहा, हज़ार नर्म हो ये बात खल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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चाँदी पिघल तो!
सुना है बर्फ़ के टुकड़े हैं दिल हसीनों के,कुछ आँच पा के ये चाँदी पिघल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दुनिया सँभल तो!
तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और,कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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वो मिल न सकेगी !
कभी वो मिल न सकेगी मैं ये नहीं कहता,वो आँख आँख में पड़ कर बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ज़ंजीर गल तो सकती!
ग़म-ए-ज़माना-ओ-सोज़-ए-निहाँ की आँच तो दे,अगर न टूटे ये ज़ंजीर गल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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अज़ल से सोई है!
अज़ल से सोई है तक़दीर-ए-इश्क़ मौत की नींद,अगर जगाइए करवट बदल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी