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जो हर ख़ुशी में तिरे!
मसर्रतों को ये अहल-ए-हवस न खो देते,जो हर ख़ुशी में तिरे ग़म को भी समो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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तमन्ना के दाग़ धो देते!
कभी तो यूँ भी उमँडते सरिश्क-ए-ग़म ‘मजरूह’,कि मेरे ज़ख़्म-ए-तमन्ना के दाग़ धो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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मिरी बेबसी पे रो देते!
जो देखते मिरी नज़रों पे बंदिशों के सितम,तो ये नज़ारे मिरी बेबसी पे रो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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सफ़ीना मिरा डुबो देते!
बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना,किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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तमसो मा ज्योतिर्गमय!
आज मैं हिंदी नवगीत के पुरोधा स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह गीत – बुझी न दीप की शिखा अनन्त में समा गई।अमंद ज्योति प्राण-प्राण बीच जगमगा गई!अथाह स्नेह के…
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आरज़ू भी खो देते!
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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गेसुओं के साए में!
कहाँ वो शब कि तिरे गेसुओं के साए में,ख़याल-ए-सुब्ह से हम आस्तीं भिगो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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जो हर ख़ुशी में तिरे!
मसर्रतों को ये अहल-ए-हवस न खो देते,जो हर ख़ुशी में तिरे ग़म को भी समो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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मिलेगा चैन तो अब!
वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ,मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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अजनबी हूँ महफ़िल में!
मुआ’फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में,कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी