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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Jan 2025

    कुछ अपने दिल की!

    कुछ अपने दिल की ख़ू* का भी शुक्राना चाहिए,सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम|*Nature फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th Jan 2025

    फीका है अब भी रंग!

    उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग,जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th Jan 2025

    रहबर से अपनी राह!

    अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें,रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th Jan 2025

    ख़फ़ा कर चुके हैं हम!

    देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही,कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th Jan 2025

    चिंता मुक्ति!

    होटल में रुके थे, काफी बडा होटल था, जहाँ तक याद है, काफी सारे रिश्तेदार आए थे, कोई शादी थी शायद। परिजन बाहर निकल गए, शायद शॉपिंग वगैरह के लिए, बाद में मैं भी होटल से बाहर निकला, होटल से कुछ बाहर आकर एक दुकान पर बैठ गए, कुछ खाने के लिए, बारात में आए…

  • 15th Jan 2025

    अब एहतियात की!

    अब एहतियात की कोई सूरत नहीं रही,क़ातिल से रस्म-ओ-राह सिवा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 15th Jan 2025

    पता कर चुके हैं हम!

    कुछ इम्तिहान-ए-दस्त-ए-जफ़ा कर चुके हैं हम,कुछ उन की दस्तरस का पता कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 15th Jan 2025

    सब कुछ निसार!

    क़र्ज़-ए-निगाह-ए-यार अदा कर चुके हैं हम,सब कुछ निसार-ए-राह-ए-वफ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 15th Jan 2025

    कि हम चल बसे!

    वो आए मगर आए किस वक़्त ‘हसरत’,कि हम चल बसे मरहबा कहते कहते| हसरत मोहानी

  • 15th Jan 2025

    अजब क्या जो है!

    अजब क्या जो है बद-गुमाँ सब से वाइज़, बुरा सुनते सुनते बुरा कहते कहते| हसरत मोहानी

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