-
काश संदल से मिरी!
काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर,इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ| परवीन शाकिर
-
दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं !
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – दिल, मेरी कायनात अकेली है—और मैं !बस अब ख़ुदा की जात अकेली है, और मैं !…
-
याद में तन्हा देखूँ!
एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ,आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ| परवीन शाकिर
-
भूलने वाले मैं कब!
शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी,भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ| परवीन शाकिर
-
तन्हाई का सहरा देखूँ!
नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ,आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ| परवीन शाकिर
-
और सिर्फ़ शाएर तू!
‘फ़राज़’ तू ने उसे मुश्किलों में डाल दिया,ज़माना साहब-ए-ज़र और सिर्फ़ शाएर तू| अहमद फ़राज़
-
कंठ सभी भर्राए!
आज मैं अपने एक मित्र और श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय श्याम निर्मम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। निर्मम जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय श्याम निर्मम जी का यह नवगीत – आँखों में सपनों की भरी नदी सूख गई,और हमें मरुथल के संग-संग बहना…
-
किसी की ख़ातिर तू
फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ,जो हो सके तो चला! आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़