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तुम मिल गए किरण से!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह गीत – दुख की अधीर बदली छितरा गई गगन से ।तुम मिल गए किरण से, हम खिल गए सुमन…
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मज़ा तो जब है कि!
कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी ‘मुनीर’,मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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कि मुझको देख के!
मैं इस ख़याल से जाता नहीं वतन की तरफ़,कि मुझ को देख के उस बुत का जी बुरा ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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पलटना चाहें वहाँ से!
न जा कि इस से परे दश्त-ए-मर्ग हो शायद,पलटना चाहें वहाँ से तो रास्ता ही न हो| मुनीर नियाज़ी
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ये शहर जम के खड़ा!
ज़मीं के गिर्द भी पानी ज़मीं की तह में भी,ये शहर जम के खड़ा है जो तैरता ही न हो| मुनीर नियाज़ी