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सांसें !
आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी और हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – शहरीले जंगल में सांसें हलचल रचती जाएंकफ़न ओस का फाड़ बीच…
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उतनी ही हर नदी है!
छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से,उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है| निदा फ़ाज़ली
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लगता है हर लिबास!
इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई,लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है| निदा फ़ाज़ली