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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Feb 2025

    यहाँ से तेरे मिरे रास्ते!

    ये एक पेड़ है आ इस से मिल के रो लें हम,यहाँ से तेरे मिरे रास्ते बदलते हैं| बशीर बद्र

  • 1st Feb 2025

    उठे बादल, झुके बादल!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी का एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक में भी शामिल थीं। व्यास जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय हरिनारायण व्यास जी की यह कविता – उधर उस नीम…

  • 1st Feb 2025

    कई सितारों को मैं!

    कई सितारों को मैं जानता हूँ बचपन से,कहीं भी जाऊँ मिरे साथ साथ चलते हैं| बशीर बद्र

  • 31st Jan 2025

    वो लोग फूल समझ!

    उन्हें कभी न बताना मैं उन की आँखों में,वो लोग फूल समझ कर मुझे मसलते हैं| बशीर बद्र

  • 31st Jan 2025

    मैं शाहराह नहीं!

    मैं शाहराह नहीं रास्ते का पत्थर हूँ,यहाँ सवार भी पैदल उतर के चलते हैं| बशीर बद्र

  • 31st Jan 2025

    घने धुएँ में फ़रिश्ते भी!

    घने धुएँ में फ़रिश्ते भी आँख मलते हैं,तमाम रात खुजूरों के पेड़ जुलते हैं| बशीर बद्र

  • 31st Jan 2025

    सीपियों में पलते हैं!

    उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं,ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं| बशीर बद्र

  • 31st Jan 2025

    कोई सँवारने वाला!

    ‘वसीम’ हम भी बिखरने का हौसला करते,हमें भी होता जो कोई सँवारने वाला| वसीम बरेलवी

  • 31st Jan 2025

    वो मेरी रातों को!

    मैं उस का दिन भी ज़माने में बाँट कर रख दूँ,वो मेरी रातों को छुप कर गुज़ारने वाला| वसीम बरेलवी

  • 31st Jan 2025

    रातें गुज़ारने वाला!

    भरे मकाँ का भी अपना नशा है क्या जाने,शराब-ख़ाने में रातें गुज़ारने वाला| वसीम बरेलवी

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