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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Apr 2025

    कि आप आइना!

    जवाब दे न सकेगा हमारी बातों का,कि आप आइना हैरान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 18th Apr 2025

    बुझे बुझे से कुछ!

    चराग़-ए-क़ुर्ब* से कर दीजिए उन्हें रौशन,बुझे बुझे से कुछ अरमान ले के आए हैं|*Nearness मंज़र भोपाली

  • 18th Apr 2025

    कि हम चराग़ भी!

    हवा ने वार किया तो जवाब पाएगी,कि हम चराग़ भी तूफ़ान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 18th Apr 2025

    मैं सब दिन पाषाण नहीं था!

    आज मैं हिंदी के विख्यात कवि स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। नरेंद्र शर्मा जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेंद्र शर्मा जी का यह गीत– मैं सब दिन पाषाण नहीं था किसी शापवश हो निर्वासित,लीन हुई चेतनता मेरी;मन-मन्दिर का दीप…

  • 17th Apr 2025

    हम अपने-आप की!

    हम अपने-आप की पहचान ले के आए हैं, नए सुख़न नए इम्कान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    मिज़ाज-ए-ईद भी !

    मिज़ाज-ए-ईद भी समझा तुझे भी पहचाना,बस एक अपने ही जी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    जो आइने से मिला!

    जो आइने से मिला आइने पे झुँझलाया,किसी ने अपनी कमी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    तमाम ‘उम्र गुज़ारी!

    तमाम ‘उम्र गुज़ारी ख़याल में जिस के,तमाम ‘उम्र उसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    कि फिर किसी ने!

    सफ़र के बीच ये कैसा बदल गया मौसम,कि फिर किसी ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

  • 17th Apr 2025

    मिरी अना ने किसी!

    कचोके देती रहीं ग़ुर्बतें मुझे लेकिन,मिरी अना ने किसी की तरफ़ नहीं देखा| मंज़र भोपाली

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