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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Apr 2025

    मय-ख़ाने में हर जाम !

    का’बे ही में हर सज्दे को कहते हैं इबादत,मय-ख़ाने में हर जाम को साग़र नहिं कहते| बिस्मिल सईदी

  • 19th Apr 2025

    रिंदों को डरा सकते हैं!

    रिंदों को डरा सकते हैं क्या हज़रत-ए-वाइ’ज़,जो कहते हैं अल्लाह से डर कर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी

  • 19th Apr 2025

    बुत-ख़ाने में काफ़िर!

    का’बे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर,बुत-ख़ाने में काफ़िर को भी काफ़िर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी

  • 19th Apr 2025

    उसे सर नहीं कहते!

    सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते,हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते| बिस्मिल सईदी

  • 19th Apr 2025

    जो तेरे शहर में!

    उन्हीं पे सारे मसाइब* का बोझ रक्खा है,जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं|*मुसीबतें मंज़र भोपाली

  • 19th Apr 2025

    क्या भाया!

    आज मैं हिंदी के विख्यात कवि स्वर्गीय श्री नेमिचंद्र जैन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नेमिचंद्र जैन जी की यह कविता– क्या भाया ?अनजाने मन क्यों इस कोलाहल में खिंच कर बह आया ?वे वन की संध्याएँ निर्जनमदिर-अरुण…

  • 18th Apr 2025

    जो पारसा हो तो!

    जो पारसा हो तो क्यूँ इम्तिहाँ से डरते हो,हम ए’तिबार का मीज़ान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 18th Apr 2025

    ये ज़ख़्म-ए-दिल नहीं!

    ये ज़ख़्म-ए-दिल नहीं एहसान की निशानी है,हम उस निगाह का एहसान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 18th Apr 2025

    धूप है ख़यालों की!

    हमारे पास फ़क़त धूप है ख़यालों की,झुलसते ख़्वाबों की दुक्कान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

  • 18th Apr 2025

    कि हम भी ‘मीर’ का!

    इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए,कि हम भी ‘मीर’ का दीवान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली

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