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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Jul 2025

    टूटकर नहीं मिलना!

    चलो ज़माने की ख़ातिर ये जब्र भी सह लें,कि अब मिले तो कभी टूट कर नहीं मिलना| सुरूर बाराबंकवी

  • 19th Jul 2025

    तुमसे गर नहीं मिलना!

    तो क्या ये तय है कि अब ‘उम्र भर नहीं मिलना,तो फिर ये ‘उम्र भी क्यों तुम से गर नहीं मिलना| सुरूर बाराबंकवी

  • 19th Jul 2025

    इच्छा-शक्ति!

    एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता– ओ ठोकर !तू सोच रहीमैं बैठ जाऊंगीरोकर,भ्रम है तेराचल दूंगी…

  • 18th Jul 2025

    मीर के बाद ग़ालिब!

    मीर के बाद ग़ालिब ओ इक़बाल,इक सदा, इक सदी में गुज़री है| गुलज़ार देहलवी

  • 18th Jul 2025

    शायरी में गुज़री है!

    यूँ तो शायर बहुत से गुज़रे हैं,अपनी भी शायरी में गुज़री है| गुलज़ार देहलवी

  • 18th Jul 2025

    ज़िंदगी रौशनी में !

    आस के जुगनुओ सदा किस की,ज़िंदगी रौशनी में गुज़री है| गुलज़ार देहलवी

  • 18th Jul 2025

    रहज़नी में गुज़री है!

    आसरा उन की रहबरी ठहरी,जिन की ख़ुद रहज़नी में गुज़री है| गुलज़ार देहलवी

  • 18th Jul 2025

    आवारगी में गुज़री है!

    कोई मौज-ए-नसीम से पूछे,कैसी आवारगी में गुज़री है| गुलज़ार देहलवी

  • 18th Jul 2025

    उम्र जो बे-ख़ुदी में!

    उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है,बस वही आगही* में गुज़री है| *जानकारी गुलज़ार देहलवी

  • 18th Jul 2025

    तो सारा ज़माना है!

    वो ऐ ‘कैफ़’ जिस दिन से मेरे हुए हैं,तो सारा ज़माना है शैदाइयों में| कैफ़ भोपाली

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