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अनुभूति!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा छायावाद युग के एक स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। पंत जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – तुम आती हो,नव अंगों काशाश्वत मधु-विभव लुटाती हो। बजते नि:स्वर…
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उदासी कमरे के!
तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही,उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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चलो कि धूप दरीचों!
उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें,चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना