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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Jul 2025

    दर्द किसी को प्यारा!

    कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है,दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    लफ़्ज़ कोई अँगारा!

    यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है,लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    एक ख़याल सहारा!

    कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है,एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    तेरे बग़ैर गुज़ारा!

    तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती,तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    कोई इतना प्यारा!

    कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है,फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है| जव्वाद शैख़

  • 22nd Jul 2025

    तरसते हैं बहुत से!

    ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है ‘मंज़र’,तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को| मंज़र भोपाली

  • 22nd Jul 2025

    पवन और पानी!

    एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री सुश्री शांति सुमन जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शांति सुमन जी का यह नवगीत– मौसम की मनमानी – वह तो हद के पार गया ।सारे अँखुवों को खेतों में…

  • 21st Jul 2025

    जाते हो दरिया देखने!

    कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी,ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को| मंज़र भोपाली

  • 21st Jul 2025

    बहुत से आइना-ख़ाने!

    बहुत से आइना-ख़ाने हैं इस बस्ती में लेकिन,तरसती है हमारी आँख चेहरा देखने को| मंज़र भोपाली

  • 21st Jul 2025

    खड़े हैं राह चलते!

    खड़े हैं राह चलते लोग कितनी ख़ामुशी से,सड़क पर मरने वालों का तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली

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