-
फूल शाख़ पर तो है!
न हिज्र है न वस्ल है अब इस को कोई क्या कहे,कि फूल शाख़ पर तो है मगर खिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
-
कोई गिला नहीं रहा!
यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा,तो शुक्र कीजिए कि अब कोई गिला नहीं रहा| जावेद अख़्तर
-
अब आगे तेरी ख़ुशी है!
तिरे करम का सज़ा-वार तो नहीं ‘हसरत’,अब आगे तेरी ख़ुशी है जो सरफ़राज़ करे| हसरत मोहानी
-
तिरी निगाह को !
उम्मीद-वार हैं हर सम्त आशिक़ों के गिरोह,तिरी निगाह को अल्लाह दिल-नवाज़ करे| हसरत मोहानी
-
ग़म-ए-जहाँ से जिसे !
ग़म-ए-जहाँ से जिसे हो फ़राग़ की ख़्वाहिश,वो उन के दर्द-ए-मोहब्बत से साज़-बाज़ करे| हसरत मोहानी
-
रँग गई पग-पग धन्य धरा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। निराला जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का यह नवगीत – रँग गई पग-पग धन्य धरा,—हुई जग जगमग मनोहरा…
-
तिरे सितम से मैं !
तिरे सितम से मैं ख़ुश हूँ कि ग़ालिबन यूँ भी,मुझे वो शामिल-ए-अरबाब-ए-इम्तियाज़ करे| हसरत मोहानी
-
जो चाहे आपका!
ख़िरद का नाम जुनूँ पड़ गया जुनूँ का ख़िरद,जो चाहे आप का हुस्न-ए-करिश्मा-साज़ करे| हसरत मोहानी
-
तिरे जुनूँ का ख़ुदा!
दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज़ाद,तिरे जुनूँ का ख़ुदा सिलसिला दराज़ करे| हसरत मोहानी
-
निगाह-ए-यार जिसे!
निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे,वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे| हसरत मोहानी