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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Feb 2025

    ज़मीं से हर कोई !

    सिमट के रह गए आख़िर पहाड़ से क़द भी,ज़मीं से हर कोई ऊँचा दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 10th Feb 2025

    कि अब तो संग भी !

    मिरी निगाह से छुप कर कहाँ रहेगा कोई,कि अब तो संग भी शीशा दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 10th Feb 2025

    तुम और मैं : दो आयाम!

    आज मैं वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                  लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – (एक) बहुत दिनों के बादहम उसी नदी के तट से गुज़रेजहाँ नहाते हुए नदी के साथ हो…

  • 9th Feb 2025

    वो भीगती पलकें!

    वो अलविदा’अ का मंज़र वो भीगती पलकें,पस-ए-ग़ुबार भी क्या क्या दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 9th Feb 2025

    जज़ीरा दिखाई देता है!

    वहीं पहुँच के गिराएँगे बादबाँ अब तो,वो दूर कोई जज़ीरा दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 9th Feb 2025

    तमाम दश्त ही!

    ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे,तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 9th Feb 2025

    साया दिखाई देता है!

    बुरा न मानिए लोगों की ऐब-जूई का,उन्हें तो दिन का भी साया दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 9th Feb 2025

    शजर पे एक ही!

    न इतनी तेज़ चले सर-फिरी हवा से कहो,शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 9th Feb 2025

    जहाँ तलक भी ये !

    जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है,मिरी तरह से अकेला दिखाई देता है| शकेब जलाली

  • 9th Feb 2025

    परंपरा!

    आज मैं देश के श्रेष्ठ हिंदी कवि और राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – परंपरा को अंधी लाठी से…

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