-
ज़मीं से हर कोई !
सिमट के रह गए आख़िर पहाड़ से क़द भी,ज़मीं से हर कोई ऊँचा दिखाई देता है| शकेब जलाली
-
कि अब तो संग भी !
मिरी निगाह से छुप कर कहाँ रहेगा कोई,कि अब तो संग भी शीशा दिखाई देता है| शकेब जलाली
-
तुम और मैं : दो आयाम!
आज मैं वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – (एक) बहुत दिनों के बादहम उसी नदी के तट से गुज़रेजहाँ नहाते हुए नदी के साथ हो…
-
वो भीगती पलकें!
वो अलविदा’अ का मंज़र वो भीगती पलकें,पस-ए-ग़ुबार भी क्या क्या दिखाई देता है| शकेब जलाली
-
जज़ीरा दिखाई देता है!
वहीं पहुँच के गिराएँगे बादबाँ अब तो,वो दूर कोई जज़ीरा दिखाई देता है| शकेब जलाली
-
साया दिखाई देता है!
बुरा न मानिए लोगों की ऐब-जूई का,उन्हें तो दिन का भी साया दिखाई देता है| शकेब जलाली
-
परंपरा!
आज मैं देश के श्रेष्ठ हिंदी कवि और राष्ट्रकवि के रूप में ख्याति प्राप्त स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। दिनकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – परंपरा को अंधी लाठी से…