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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 26th Apr 2025

    हो सके तो चला आ!

    फ़ज़ा उदास है रुत मुज़्महिल है मैं चुप हूँ,जो हो सके तो चला आ किसी की ख़ातिर तू| अहमद फ़राज़

  • 26th Apr 2025

    ये हर मक़ाम पे !

    हँसी-ख़ुशी से बिछड़ जा अगर बिछड़ना है,ये हर मक़ाम पे क्या सोचता है आख़िर तू| अहमद फ़राज़

  • 26th Apr 2025

    दुनिया तुझे बदल देगी!

    मैं जानता हूँ कि दुनिया तुझे बदल देगी,मैं मानता हूँ कि ऐसा नहीं ब-ज़ाहिर तू| अहमद फ़राज़

  • 26th Apr 2025

    तिरा ख़याल कि शाख़!

    मिरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ,तिरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू| अहमद फ़राज़

  • 26th Apr 2025

    अधूरी समाप्तियां !

    आज मैं विख्यात गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत– सब समाप्त हो जाने के पश्चात भीकुछ ऐसा हैजो कि अनहुआ रह जाता है चलते-चलते राह कहीं चुक…

  • 25th Apr 2025

    हुई है शाम तो!

    हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू, कहाँ गया है मिरे शहर के मुसाफ़िर तू| अहमद फ़राज़

  • 25th Apr 2025

    कितना अच्छा था कि!

    कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’,ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 25th Apr 2025

    सामने उम्र पड़ी है!

    सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की,वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 25th Apr 2025

    अब तिरे ज़िक्र पे !

    अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं,कितनी रग़बत थी तिरे नाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

  • 25th Apr 2025

    लोग उजड़ जाते हैं!

    ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तू ने,लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले| अहमद फ़राज़

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