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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 27th Apr 2025

    फूल चढ़ाने आ जाते!

    जिन लोगों ने उन की तलब में सहराओं की धूल उड़ाई,अब ये हसीं उन की क़ब्रों पर फूल चढ़ाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Apr 2025

    शाम आते ही आँखों!

    दिन भर जो सूरज के डर से गलियों में छुप रहते हैं,शाम आते ही आँखों में वो रंग पुराने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Apr 2025

    कैसे कैसे लोग हमारे!

    जब भी घर की छत पर जाएँ नाज़ दिखाने आ जाते हैं,कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलाने आ जाते हैं| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Apr 2025

    बर्बादी के अफ़्साने!

    सुनेगा जब ज़माना मेरी बर्बादी के अफ़्साने,तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले| क़तील शिफ़ाई

  • 27th Apr 2025

    सितारे शाम से पहले!

    न जाने क्यूँ हमें इस दम तुम्हारी याद आती है,जब आँखों में चमकते हैं सितारे शाम से पहले| क़तील शिफ़ाई

  • 27th Apr 2025

    हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!

    आज मैं विख्यात गीतकार स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। रंग जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत– हम अधिकारी नहीं समय की अनुकम्पाओं के!पुराना सब कुछ बुरा न रहा,नया भी सब कुछ नहीं…

  • 26th Apr 2025

    मिरी तक़दीर का तारा!

    गिरा है टूट कर शायद मिरी तक़दीर का तारा, कोई आवाज़ आई थी शिकस्त-ए-जाम से पहले| क़तील शिफ़ाई

  • 26th Apr 2025

    कोई गर्दिश नहीं थी!

    ये आलम देख कर तू ने भी आँखें फेर लीं वर्ना,कोई गर्दिश नहीं थी गर्दिश-ए-अय्याम से पहले| क़तील शिफ़ाई

  • 26th Apr 2025

    तड़पती हैं तमन्नाएँ!

    तड़पती हैं तमन्नाएँ किसी आराम से पहले,लुटा होगा न यूँ कोई दिल-ए-नाकाम से पहले| क़तील शिफ़ाई

  • 26th Apr 2025

    सिर्फ़ शाएर तू!

    ‘फ़राज़’ तू ने उसे मुश्किलों में डाल दिया,ज़माना साहब-ए-ज़र और सिर्फ़ शाएर तू| अहमद फ़राज़

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