-
युगों युगों से यूँही!
न कोई सम्त न जादा न मंज़िल-ए-मक़्सूद,युगों युगों से यूँही बे-रुख़ी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
-
तिश्नगी की क़ैद में हूँ!
शराब मेरे लबों को तरस रही होगी,मैं रिंद तो हूँ मगर तिश्नगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
-
वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में फिल्म ‘प्यार का सागर’ के लिए मुकेश जी का गाया यह गीत शयर कर रहा हूँ- वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए, वो वादे मोहब्बत के क्या हो गए! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। ********
-
मैं अपने ज़ेहन की!
कभी जुनूँ तो कभी आगही की क़ैद में हूँ,मैं अपने ज़ेहन की आवारगी की क़ैद में हूँ| कृष्ण बिहारी नूर
-
नाकाफ़ी लगती है हर ज़बान!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – नाकाफ़ी लगती है हर ज़बान ।कोई अक्षरकोई शब्द किसी भाषा कापूरा-पूरा कैसे व्यक्त करेक्या कुछ…
-
गर्द-ए-राह की सूरत!
गर्द-ए-राह की सूरत साँस साँस है ऐ ‘नूर’,मीर-ए-कारवाँ मैं हूँ क़ाफ़िला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
-
अपनी अपनी ताबीरें!
अपनी अपनी ताबीरें ढूँढता है हर चेहरा,चेहरा चेहरा पढ़ लीजे तज़्किरा है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
-
हौसला है ख़्वाबों का!
देखें इस कशाकश का इख़्तिताम हो कब तक,जागने की ख़्वाहिश है हौसला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर
-
एक शब के टुकड़ों के!
एक शब के टुकड़ों के नाम मुख़्तलिफ़ रखे,जिस्म-ओ-रूह का बंधन सिलसिला है ख़्वाबों का| कृष्ण बिहारी नूर