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ज़िन्दगी अपनी हुई है!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। माहेश्वर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – चीख़ बनते जा रहेहम सब खदानों कीहो गए हैं शोकधुनबजते पियानो की । कल…
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नाज़ उठाते रहिए!
ज़िंदगी भी किसी महबूब से कुछ कम तो नहीं, प्यार है उस से तो फिर नाज़ उठाते रहिए| हफ़ीज़ बनारसी
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दौलत-ए-इश्क़!
दौलत-ए-इश्क़ नहीं बाँध के रखने के लिए,इस ख़ज़ाने को जहाँ तक हो लुटाते रहिए| हफ़ीज़ बनारसी
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आपस में लड़ोगे तुम!
रिंदों को ‘हफ़ीज़’ इतना समझा दे कोई जा कर,आपस में लड़ोगे तुम वाइ’ज़ का भला होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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दीवाने से दीवाना!
फ़र्ज़ानों का क्या कहना हर बात पे लड़ते हैं,दीवाने से दीवाना शायद ही लड़ा होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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दीवाना लिपट जाए!
कतरा के तो जाते हो दीवाने के रस्ते से,दीवाना लिपट जाए क़दमों से तो क्या होगा| हफ़ीज़ बनारसी
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चुप रहिए तो बर्बादी!
क्या तेरा मुदावा हो दर्द-ए-शब-ए-तन्हाई,चुप रहिए तो बर्बादी कहिए तो गिला होगा| हफ़ीज़ बनारसी