-
हमारे दाग़-ए-दिल!
हमारे दाग़-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,गुलों से गुल-रुख़ों से मह-वशों से माह-पारों से| कैफ़ भोपाली
-
रौशनी आवाज़ देती है!
सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है,पहाड़ों से गुफाओं से बयाबानों से ग़ारों से| कैफ़ भोपाली
-
फूलों से सितारों से!
उन्हें मैं छीन कर लाया हूँ कितने दावेदारों से,शफ़क़ से चाँदनी रातों से फूलों से सितारों से| कैफ़ भोपाली
-
हसीनों से रक़ीबों से!
तन-ए-तन्हा मुक़ाबिल हो रहा हूँ मैं हज़ारों से,हसीनों से रक़ीबों से ग़मों से ग़म-गुसारों से| कैफ़ भोपाली
-
श्याम रंग में रंगी चुनरिया!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ गीत कवि श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – श्याम रंग में रंगी चुनरियाकौन दूसरा तंग खिलेगा? बैठी हूँ मैं ठगी-ठगी-सीसोई-सोई, जगी जगी…
-
बेवफ़ाई का ज़माना है!
बेवफ़ाई का ज़माना है मगर आप ‘हफ़ीज़’,नग़्मा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा सब को सुनाते रहिए| हफ़ीज़ बनारसी
-
आप काँटे मिरी राहों!
फूल बिखराता हुआ मैं तौ चला जाऊँगा,आप काँटे मिरी राहों में बिछाते रहिए| हफ़ीज़ बनारसी