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ख़ून से उजला करो!
दुख अँधेरों का अगर मिटता नहीं है ज़ेहन से,रात के दामन को अपने ख़ून से उजला करो| मंज़र भोपाली
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ख़्वाब मत देखा करो!
ज़िंदगी जीने का पहले हौसला पैदा करो, सिर्फ़ ऊँचे ख़ूबसूरत ख़्वाब मत देखा करो| मंज़र भोपाली
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दशहरे से दिवाली से!
वो दिन भी हाए क्या दिन थे जब अपना भी तअ’ल्लुक़ था,दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से| कैफ़ भोपाली
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क्यों आखिर क्यों?
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ संपादक एवं कवि स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। नंदन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैया लाल नंदन जी का यह गीत – हो गई क्या हमसेकोई भूल?बहके-बहके लगने लगे फूल! अपनी समझ में…
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दिलासों से सहारों से!
ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं,उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से| कैफ़ भोपाली
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कुओं से पनघटों से!
हमेशा एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है,कुओं से पनघटों से नद्दियों से आबशारों से| कैफ़ भोपाली
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अदाओं से इशारों से!
कभी होता नहीं महसूस वो यूँ क़त्ल करते हैं,निगाहों, कनखियों से अदाओं से इशारों से| कैफ़ भोपाली
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हमारे दाग़-ए-दिल!
हमारे दाग़-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,गुलों से गुल-रुख़ों से मह-वशों से माह-पारों से| कैफ़ भोपाली