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सत्य तो बहुत मिले!
आज मैं हिंदी साहित्य के विराट व्यक्तित्व स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता – खोज़ में जब निकल ही आयासत्य तो बहुत मिले ।…
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यूँही आ निकला था!
ये जगह हैरत-सराए है कहाँ थी ये ख़बर,यूँही आ निकला था मैं तो सैर करने के लिए| शहरयार
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रंग क्या कोई बचा है!
अब ज़मीं क्यूँ तेरे नक़्शे से नहीं हटती नज़र,रंग क्या कोई बचा है इस में भरने के लिए| शहरयार
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चाँद से जब भी कहा!
इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा,चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार
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मैं ने सब तय्यारियाँ!
आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए,मैं ने सब तय्यारियाँ कर ली हैं मरने के लिए| शहरयार
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शेरों में जो ख़ूबी है!
कहते हैं मिरे हक़ में सुख़न-फ़हम बस इतना,शेरों में जो ख़ूबी है मुआ’नी* से नहीं है|*SecondMeaning शहरयार
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दोहराता नहीं मैं भी!
दोहराता नहीं मैं भी गए लोगों की बातें,इस दौर को निस्बत भी कहानी से नहीं है| शहरयार
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फ़ुर्सत जिन्हें अब!
कल यूँ था कि ये क़ैद-ए-ज़मानी से थे बेज़ार,फ़ुर्सत जिन्हें अब सैर-ए-मकानी से नहीं है| शहरयार
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रिश्ता मिरी प्यास का!
शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है,रिश्ता ही मिरी प्यास का पानी से नहीं है| शहरयार