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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st May 2025

    सीने से उस परी के!

    आँखों में मेरी सुब्ह-ए-क़यामत गई झमक,सीने से उस परी के जो पर्दा उलट गया| नज़ीर अकबराबादी

  • 21st May 2025

    दिल साफ़ ले लिया है!

    क्या खेलता है नट की कला आँखों आँखों में, दिल साफ़ ले लिया है जो पूछा तो नट गया| नज़ीर अकबराबादी

  • 21st May 2025

    वो पेड़ क्या हरा हो!

    मैं इश्क़ का जला हूँ मिरा कुछ नहीं इलाज, वो पेड़ क्या हरा हो जो जड़ से उखट गया| नज़ीर अकबराबादी

  • 21st May 2025

    फ़रहाद था तो!

    फ़रहाद था तो शीरीं के ग़म में मुआ ग़रीब,लैला के ग़म में आन के मजनूँ भी लट गया| नज़ीर अकबराबादी

  • 21st May 2025

    बहती हवा – रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 20th May 2025

    कलेजा उलट गया!

    जब मैं सुना कि यार का दिल मुझ से हट गया,सुनते ही इस के मेरा कलेजा उलट गया| नज़ीर अकबराबादी

  • 20th May 2025

    एक भी अपना नहीं!

    किस तरह वो दिन भुलाऊँ जिस बुरे दिन का शरीक, एक भी अपना नहीं था और बेगाने कई| नज़ीर बनारसी

  • 20th May 2025

    वर्ना महफ़िल में थे!

    मुझ को चुप रहना पड़ा बस आप का मुँह देख कर, वर्ना महफ़िल में थे मेरे जाने पहचाने कई| नज़ीर बनारसी

  • 20th May 2025

    सारी दुनिया आ रही!

    सारी दुनिया आ रही है देखने के वास्ते, सर-फिरों ने एक कर डाले हैं वीराने कई| नज़ीर बनारसी

  • 20th May 2025

    आ गए दीवानगी की!

    अक़्ल बढ़ कर बन गई थी दर्द-ए-सर जाते कहाँ,आ गए दीवानगी की हद में फ़रज़ाने कई| नज़ीर बनारसी

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