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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Aug 2025

    कहानी सुनाते रहे!

    नन्हे बच्चों ने छू भी लिया चाँद को,बूढ़े बाबा कहानी सुनाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Aug 2025

    आँसुओं से इन आँखों में!

    शाम आई तो बिछड़े हुए हम-सफ़र,आँसुओं से इन आँखों में आते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Aug 2025

    घर के अंदाज़ ही!

    आँखें मंज़र हुईं कान नग़्मा हुए,घर के अंदाज़ ही घर से जाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 16th Aug 2025

    एक पत्ता गलत उठाया था!

    आज प्रस्तुत है एक और गीतआप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- आज तक ये मलाल कायम है,एक पत्ता गलत उठाया था। कब समझ साथ सदा देती हैलोभ भी काम किया करता है,आदमी बुद्धिमान कितना हो,भूल तो सुबह-शाम करता है देर तक सालती हैं वे भूलेंखुद को जिनसे न रोक पाया था। जिस तरह बीज फला करते…

  • 15th Aug 2025

    टूटी छतें आज़माते रहे!

    बारिशें आईं और फ़ैसला कर गईं,लोग टूटी छतें आज़माते रहे| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2025

    हाथों से जाते रहे!

    मेरे ग़म को जो अपना बताते रहे,वक़्त पड़ने पे हाथों से जाते रहे| वसीम बरेलवी

  • 15th Aug 2025

    तो धज्जियाँ उड़ जाएँ!

    बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर,जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी

  • 15th Aug 2025

    तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ!

    हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से,सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी

  • 15th Aug 2025

    अगर ज़मीन से फूंकें!

    रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़ हैं हम लोग,अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी

  • 15th Aug 2025

    कब कहाँ उड़ जाएँ!

    बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की,ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी

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