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खोल देता है कोई!
चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू,खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए| जाँ निसार अख़्तर
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तिलिस्मों की रिदा!
ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया,ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा* रात गए|*चादर जाँ निसार अख़्तर
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वैभव के अमिट चरण-चिह्न!
आज मैं श्रेष्ठ राजनेता, हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और कवि भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की यह कविता – विजय का पर्व!जीवन संग्राम की काली घड़ियों मेंक्षणिक…
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गर्मी-ए-हुस्न में वो!
बर्क़ अगर गर्मी-ए-रफ़्तार में अच्छी है ‘अमीर‘, गर्मी-ए-हुस्न में वो बर्क़-जमाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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आँखें दिखलाते हो!
आँखें दिखलाते हो जोबन तो दिखाओ साहब,वो अलग बाँध के रक्खा है जो माल अच्छा है| अमीर मीनाई
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ये ख़याल अच्छा है!
आ गया उस का तसव्वुर तो पुकारा ये शौक़,दिल में जम जाए इलाही ये ख़याल अच्छा है| अमीर मीनाई
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देख ले बुलबुल ओ!
देख ले बुलबुल ओ परवाना की बेताबी को,हिज्र अच्छा न हसीनों का विसाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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एक सवाल अच्छा है!
तुझ से माँगूँ मैं तुझी को कि सभी कुछ मिल जाए,सौ सवालों से यही एक सवाल अच्छा है| अमीर मीनाई
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हम मरे जाते हैं!
अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है,हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है| अमीर मीनाई